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MGR से विजय तक: दक्षिण भारत में सुपरस्टार्स का राजनीति से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर

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तमिलनाडु में थलापति विजय के मुख्यमंत्री बनने के साथ दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों की राजनीति में सफलता की परंपरा और मजबूत हो गई है। जानिए एमजीआर, जयललिता, एनटीआर, पवन कल्याण और अन्य सितारों के सत्ता तक पहुंचने का पूरा सफर।

दक्षिण भारत की राजनीति और सिनेमा का रिश्ता हमेशा बेहद खास रहा है। यहां फिल्मी सितारों को केवल कलाकार नहीं बल्कि जननायक के रूप में देखा जाता रहा है। तमिलनाडु की राजनीति तो विशेष रूप से ऐसी रही है जहां बड़े पर्दे पर लोकप्रियता हासिल करने वाले कलाकार सीधे सत्ता के शिखर तक पहुंचे। अब इसी परंपरा में एक और नाम जुड़ गया है — थलापति विजय। तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) की शानदार चुनावी सफलता के बाद विजय तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। इसके साथ ही दक्षिण भारत में फिल्मों से राजनीति और फिर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने की ऐतिहासिक परंपरा को नया अध्याय मिल गया है।

तमिलनाडु में फिल्म और राजनीति का मेल कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत उस दौर में हुई जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका था। इसी दौर में उभरे मारुतूर गोपालन रामचंद्रन यानी एमजीआर ने जनता के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि लोग उन्हें अभिनेता से ज्यादा मसीहा मानने लगे।

1930 और 40 के दशक में फिल्मों में संघर्ष करने वाले एमजीआर ने धीरे-धीरे तमिल सिनेमा पर अपना दबदबा कायम किया। उनकी फिल्मों में गरीबों, शोषितों और आम जनता के हितैषी किरदारों ने उन्हें लोगों के बीच असाधारण लोकप्रियता दिलाई। यही लोकप्रियता बाद में राजनीतिक ताकत में बदल गई।

शुरुआत में कांग्रेस के करीब रहे एमजीआर बाद में द्रविड़ राजनीति की ओर बढ़े और डीएमके से जुड़े। लेकिन पार्टी नेतृत्व से मतभेद और राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें अलग राह चुनने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने एआईएडीएमके की स्थापना की और 30 जून 1977 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया। वे दक्षिण भारत में अभिनेता से मुख्यमंत्री बनने वाले पहले सुपरस्टार बने।

एमजीआर का शासन केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मिड-डे मील जैसी योजनाओं की शुरुआत कर गरीब वर्गों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई। उनकी मृत्यु के बाद भी उनका प्रभाव तमिल राजनीति में लंबे समय तक बना रहा।

एमजीआर के बाद जिस चेहरे ने तमिल राजनीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव डाला, वह थीं जयललिता। फिल्मों में बेहद सफल करियर बनाने वाली जयललिता ने अपने अभिनय और व्यक्तित्व से लाखों प्रशंसक बनाए। उन्होंने कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया और एमजीआर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से लोकप्रिय रही।

राजनीति में आने के बाद जयललिता ने खुद को केवल अभिनेत्री नहीं बल्कि एक मजबूत राजनीतिक नेता के रूप में स्थापित किया। एमजीआर की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके में नेतृत्व संघर्ष शुरू हुआ, लेकिन जयललिता ने कठिन परिस्थितियों में खुद को पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया।

1989 की तमिलनाडु विधानसभा की घटना आज भी राजनीतिक इतिहास में याद की जाती है, जब विधानसभा के भीतर उनके साथ अभद्र व्यवहार हुआ। उस घटना ने जनता के बीच उनके प्रति सहानुभूति और समर्थन को और मजबूत कर दिया। 1991 में जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनीं और बाद में तमिल राजनीति की सबसे शक्तिशाली महिला नेता के रूप में उभरीं।

हालांकि दक्षिण भारत में अभिनेता से मुख्यमंत्री बनने की कहानी केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रही। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने भी इसी परंपरा को नई ऊंचाई दी। पौराणिक फिल्मों में भगवान के किरदार निभाकर लोगों के बीच देवतुल्य छवि बनाने वाले एनटीआर ने तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना की और रिकॉर्ड समय में सत्ता तक पहुंच गए।

उनकी राजनीति क्षेत्रीय अस्मिता और तेलुगु स्वाभिमान के इर्द-गिर्द घूमती रही। जनता का जबरदस्त समर्थन उन्हें कई बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले गया। हालांकि बाद के वर्षों में पारिवारिक और राजनीतिक संघर्षों ने उनके राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया।

दक्षिण भारत की राजनीति में रजनीकांत का नाम भी लंबे समय तक चर्चा में रहा। सुपरस्टार रजनीकांत को लेकर हमेशा अटकलें लगती रहीं कि वे राजनीति में आएंगे। उन्होंने कई बार राजनीतिक बयान दिए और जनता के बीच भारी समर्थन भी दिखाई दिया, लेकिन अंततः उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।

कमल हासन ने राजनीति में औपचारिक प्रवेश करते हुए अपनी पार्टी बनाई और सामाजिक मुद्दों पर मुखर राजनीति की शुरुआत की। हालांकि वे अब तक मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सके, लेकिन तमिल राजनीति में उनकी मौजूदगी लगातार बनी हुई है।

विजयकांत भी ऐसे अभिनेता रहे जिन्होंने अपनी पार्टी बनाकर राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी पार्टी डीएमडीके ने शुरुआती दौर में ही उल्लेखनीय वोट हासिल कर तमिल राजनीति में तीसरे विकल्प की भूमिका निभाई।

आंध्र प्रदेश में पवन कल्याण ने भी अभिनेता से नेता बनने का सफर तय किया। जन सेना पार्टी के जरिए उन्होंने युवाओं और मध्यम वर्ग के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। शुरुआती राजनीतिक संघर्षों के बाद उन्हें चुनावी सफलता मिली और वे उपमुख्यमंत्री पद तक पहुंचे।

अब तमिल राजनीति में सबसे नया और चर्चित चेहरा थलापति विजय का है। विजय ने फिल्मों में एक लंबे समय तक सुपरस्टार के रूप में राज किया। उनकी फिल्मों में सामाजिक संदेश, भ्रष्टाचार विरोध और युवा मुद्दों को प्रमुखता से दिखाया जाता रहा। यही कारण रहा कि उनके प्रशंसकों का दायरा केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहा।

2024 में विजय ने तमिलगा वेत्री कझगम की स्थापना कर राजनीति में औपचारिक एंट्री की। शुरुआत में इसे केवल स्टार पावर माना गया, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन कर सभी राजनीतिक समीकरण बदल दिए। गठबंधन सहयोग और जनता के समर्थन के दम पर विजय अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता केवल लोकप्रियता का खेल नहीं है। यहां फिल्मी सितारों को सामाजिक परिवर्तन, क्षेत्रीय पहचान और जनता की उम्मीदों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि सुपरस्टार्स का प्रभाव चुनावी राजनीति में भी दिखाई देता है।

विजय के मुख्यमंत्री बनने के साथ अब एक बार फिर यह साबित हो गया है कि दक्षिण भारत में फिल्मों से राजनीति तक का रास्ता आज भी उतना ही मजबूत और प्रभावशाली है जितना एमजीआर और जयललिता के दौर में था।

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